अकेलापन..

कितनी अकेली हूँ मैं

बहुत अकेली…

अब जैसे

तन्हाई भी चुभती है

मुझे…

दोस्तों का साथ तो है

पर ज़िन्दगी भर

कहाँ?

साथी था,प्यार था

उसने भी छोड़ दिया..

कितनी अकेली हूँ मैं…

परिवार…मेरे लिए तो

कुछ भी नहीं है

रोज़ झगड़े,मारना-पीटना

आँसुओं का बहाव!!

ये भी कोई जीना है??

न प्यार मिला अपनों से

न बाहार से

चारों तरफ़ पाया है मैंने

धोखा…

घर में अजनबीपन-सा

जीना…

बाहर खुशी का मुखौटा

पहनना…

और क्या कहूँ?

कम्बख़त मौत भी नहीं

आती….

लेकिन जीना है मुझे

अपने भाई और माँ

के लिए…

लेकिन फिर भी

कितनी अकेली हूँ मै…

 

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इतिहास बोध व पूर्वज़ों की व्यथा का स्वर

“वह अनजान प्रवासी

देश अंधे इतिहास ने न तो उसे देखा था

न तो गूँगे इतिहास ने
कभी सुनाई उसकी पूरी कहानी हमें
न ही बहरे इतिहास ने सुना था उसके चीत्कारों को
जिसकी इस माटी पर बही थी पहली बूँद पसीने की
जिसने  चट्टानों के बीच थी हरियाली उगाई थी
नंगी पीठों पर सहकर बाँसों की बौछार
बहा-बहाकर लाल पसीना
वह पहला गिरमिटिया इस माटी का बेटा
जो मेरा भी अपना था,तेरा भी अपना!
इतिहास बोध कवि को अपने अतीत से जोड़ते है और वर्तमान की चुनौतियों का सामना करने के लिए साहस और शक्ति देता है।यह इतिहास मॉरीशस के भारतीय शर्तबंद मज़दूर के आगमन और उनके जीवन-संघर्ष से  संबंधित हैं।उन पुरखों ने अपना खून-पसीना बहाया,अपने त्याग तथा कठोर परिश्रम से इस देश को उन्नत बनाया।स्थानीय कवियों ने उन भारतीय मज़दूरों की व्यथा-कथा को विस्तार से अपनी कवितओं में अभिव्यक्त किय है।

यही सब चीज़ें मुनीश्वरलाल चिन्तामणी जी की एक कविता में भी पाया जाता है।यथा:-
“पीड़ा का पहरा था

उनके प्राणों पर।
ग़म की चादर थी
उनकी साँसों पर।
सुख-सुविधाएँ भागती थीं
दूर उनसे,
हार पर हार
मिली थी जीवन में
पर प्राण जब तक शेष रहे,
रक्षक बने रहे-
उसके,
जिसके तुम आज अपना सुख कहते हो।”
इन पूर्वज़ों के मूक इतिहास को स्थानीय कवियों ने कितनी सुन्दरता,भावनात्मक ढंगसे एवं उनकी व्यथा-कथा को दर्शाते हुए अपनी कविताओं में वाणी दी हैं।इसी संदर्भ में ज्ञानेश्वर रघुवीर ने इस प्रसंग क एक चित्र  प्रस्तुत किया है-
“बिके भारतीय पाँच रुपए में ले सोने की आस।

पत्थर के नीचे कीड़े दीख हो गए निरास।।
बदले सोने के मिली कोड़ों और बाँसों की मार।
जुल्म देख धरती पर आकाश भी करने लगा पुकार।।”