जाति समस्या की प्रासंगिकता

जाति समस्या की प्रासंगिकता

“दुनिया के दो मालिक(जगदीश) कहाँ से आए?तुझे इस भ्रम में किसने डाल दिया है?अल्लाह,राम,रहीम अलग-अलग कैसे हो सकते हैं?एक सोने से सब गहने बनाए गए हैं।यह सब एक नमाज़,एक पूजा कहने-सुनने की बातें हैं।इनको अपने अस्तित्व से दूर कर दे।वही महादेव है,वही मुहम्मद।जो ब्रह्म है उसी को आदम कहना चाहिए।कोई हिन्दू कहलाता है और कोई मुसलमान,लेकिन रहते हैं हैं सभी एक ही ज़मीन पर।एक वेद पढ़ता है और एक ख़ुत्बा।एक मौलाना कहलाता है और एक पंडित.नाम अलग-अलग रख लिए गए हैं,वैसे बरतन सब एक ही मिट्टी के हैं।”

कबीरदास की इन पँक्तियों में कितनी सच्चाई है।जब कबीरदास जीवित थे तब उन्होंने कितनी सुन्दरता से,प्रेमसे अपने विचारों का प्रचार-प्रसार किया।तभी से हिन्दू और मुसलमान सम्प्रदायों में एकता बनी रहती थी।लेकिन आज क्या हो रहा है?

आज भी इस संसार में हिंसा,आतंक,जातिवाद आदि के कारण निर्दोष लोगों पर अत्याचार हो रहे हैं।ऐसी भयावह परिस्थिथि में कबीर तो सच्चे-अर्थों में मानवतावादी थे।उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों के बीच मानवता का सेतु बाँधा।पर आज वह सेतु भग्नावस्था में है।इसके पुन: निर्माण की आवश्यक्ता है।कबीर के विचार समाज को नई दिशा दिखा सकता है।

आक्रोश!!

कोई बता सकता है कि

स्वतंत्रता क्या है??

कोई कहता है-आज़ादी!!

लेकिन आज़ादी किस बात की?

मानती हूँ कि हमें विदेश
जाने की,खाने-पीने की,
रहने की,बात करने की
आज़ादी है!!लेकिन क्या
सचमें यह आज़ादी है??

दिन-ब-दिन सामान के
बढ़ते दामों को देखकर,
दुनिया भरमें भ्रष्टाचार
का फैलाव देखकर,
नौकरी पाने के लिए
पूँजिपतियों के आगे खुककर,
केवल उनकी बातों में
“हाँ” मिलाकर,
क्या यही आज़ादी है?

मानती हूँ कि बाँसों की बौछारें,
गालियों की बरसात नहीं होती है…
पर अप्रत्यक्ष रूप से हम
इन सबको सह रहे हैं…

सरकारी नौकरी अगर मिली
तो हमें डबाया जाता है….क्यों?
इसी डर से कि कहीं
हाथ से नौकरी न गँवा बैठे!

आखिर कब-तक हम
ऐसे डबे हुए होंगे?
मैं पूछती हूँ कि आज़ादी
मिली भी तो किस बात की?
इन सब को अगर सहना आज़ादी
है,तो नहीं चाहिए मुझे
ऐसी आज़ादी!!!!!!
क्या फ़ायदा इस “आज़ादी” का
जबकि हम अभी-भी
“ग़ुलाम ” है?

मॉरीशस की स्वतंत्रता के पीछे छिपे संघर्ष

 

आज,१२ मार्च २०१२,सभी लोग स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं.स्कूलों में,संस्थानों में,इत्यादि जगहों में हमारा चौरंगा झंडा लहराया जा रहा है.आज ही के दिन,सभी लोग मनमें उत्साह लिए,एक नई उमंग के साथ अपने देशको.मॉरीशस को सलाम कर रहे हैं.

 

“ लेकिन क्या किसी ने स्वतंत्रता दिलवाने के लिए, उन महान पुरुषों के त्याग, श्रम या त्यागके बारे में सोचा?”

मॉरीशस तो पहले एक अंग्रेज़ी उपनिवेश था.जब गोरों का शासन था तो वे मॉरीशस टापुको हथियाना चाहते थे.सभी लोगों पर शोषण करते थे.एक समय ऐसा आया कि काम करने के लिए लोगों की कमी पड़ गई,तो उन्होंने भारतसे “गिरमिटिया मज़दूरों” को लाया गया.लिखित इक़रारसे खेती आदि में काम करने के लिए हिन्दुस्तानसे जो “कुली” आते थे उनको “गिरमिटिया कुली” कहा जाता था.अंग्रेज़ी एग्रीमेन्ट “Agreement” शब्दका अपभ्रष्ट रूप “गिरमिट” है.उस एग्रीमेन्टमें लिखा जाता था कि उनको ३ या ५ सालों तक खेती या अन्य स्थानों पर काम करना होगा,५ अथवा ६ रुपए मासिक वेतन मिलेगा तथा चावल,दाल,मच्छी,तेल,निमक आदि ख़ुराककी चीज़ें अमुक प्रमाण में मिलेंगे और अगर अवधि समाप्त होने पर उन्हें हिन्दुस्तान लौटना हो तो जहाज़का किराया सरकार की ओरसे मिलेगा इत्यादि प्रकारकी शर्तें हुआ करती थीं.लेकिन यहाँ पर आने के पश्चात,रहने का कुछ प्रबंधन नहीं होता था,दवा-दारुका कोई ठिकाना नहीं था और न ही कामके कोई नियम बने हुए थे.सन १८३४ तक जो कुली आया करते थे उनको असह्य यातनाएँ भुगतनी पड़ती थीं.सरकारी अधिकार कुलियों पर कुछ नहीं था,इससे सरकार उनके लिए कुछ भी न कर सकती थी.

 

कहते हैं कि रातको दो बजे कुली को उसकी झोंपड़ी में से खींचके कामपर ले जाया करते थे और ८ य १० बजे रात्रीको उसकॊ छुट्टी मिलती थी.बूढ़े कुली कहा करते हैं कि:-

 

 

 

“कोठी के कर्मचारी गाड़ी में डंडोंको लादकर कुलीको बाहर निकाला जाता था.”

 

एक दिन की अनुपस्थितिके लिए दो दिन की तलब काटी जाती थी.इसको “डबल कट” दूनी काट कहते हैं.उनपर बाँसों की बौछारें होती थीं.भगवान ही जानते थे कि उन पर और कितना ज़ुल्म हुआ होगा!!लेकिन उन भारतीय प्रवासियोंने इस अनजान देशको अपना मानकर,इन सब अत्याचारोंको सहकर,मॉरीशसको अपने ख़ून-पसीने से या “लाल-पसीने” बहाकर स्वर्ग बनाया.

 

इसके अतिरिक्त,जब सन १९०१ में महात्मा गान्धी जी मॉरीशस पधारे थे,तबभी देश की दशा कुछ ठीक नहीं थी.उन्होंने मणिलाल डॉक्टर को भेजा.ऐसी कंटकित परिस्थितिमें इस निर्भीक योद्धा ने हमारे पूर्वज़ों की सेवा की थी.कोई ५ वर्षों तक यहाँ की विषम परिस्थितियों में संघर्ष करके,मणिलाल डॉक्टर ने धार्मिक संगठन,एक शैक्षिक संगठन,एक समाचार पत्र,एक छापाखाना भारतीय प्रजाको देकर यहाँसे सन १९१२ से प्रस्थान किया था.

 

एक और महान पुरुष हैं जिन्होंने मॉरीशस की स्थितियोंको सुधारा.डॉ.शिवसागर रामगुलामजी जो प्रवासी भारतियों का एक अद्भुत राजनेता थे,मॉरीशस के इतिहास में महनीय स्थान रखते हैं.मज़दूर दलके नेता बनकर,उन्होंने महात्मा गान्धी जी के मार्गों पर चलकर,शांतिपूर्ण तरीकेसे ब्रिटिश सरकार के सामने अपनी माँगें पेश करते रहे.इसके परिणामस्वरूप,देशको एक के बाद एक संविधानके ज़रिए,१२ मार्च १९६८ को मॉरीशस आज़ाद हुआ.

 

देशको चौरंगा झंडा मिला और मॉरीशस एक राष्ट्र के रूपमें संयुक्त राष्ट्र संघ राष्ट्र कुल,गुट निरपेक्ष संगठन और अफ़्रीकी एकता संगठनों जैसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठनॊं में अपना नाम लिखवा पाया.

 

अपर्युक्त तथ्योंसे हमें यह आभास होता है कि किस प्रकार इस छोटे-से टापुको,मॉरीशसको,अंतत: सही अर्थोंमें आज़ादी मिला.मैं उन सभी लोगों को तहे दिलसे धन्यवाद करती हूँ जिनके कारण हम आज आज़ाद हैं.