ज़िंदगी का नाता

ज़िंदगी का नाता

ज़िंदगी मेरी थम सी गई थी
बेपनाह, अकेलापन दु:ख से घिरी
रोज़ अन्दर-ही-अन्दर घुट कर जी रही थी
खुशियाँ जैसे दामन छूकर चली जाती थी
तुम जब आए, तब भी मेरी ज़िंदगी किसी सूखे पत्ते से कम नहीं थी..
तुमको कितना दु:ख दिया \पर तुमने एक बार भी हार नहीं माना
आज जो मैं इतनी खुश हूँ,
वो तुम्हारी वजह से..
आज जब भी मैं अकेले में मुस्कराती हूँ,
वो भी तुम्हारी बदौलत…
मेरी खुशियों के पीछे, मेर हँसी के पीछे,तुम्हीं तो हो!
बस यही डर लगा रहता है कि
बाद में ऐसा कुछ न हो जाए
कि मेरे ग़म और आँसू के वजह तुम बनो!

 

ज़िंदगी…

ज़िंदगी…

जो हम ज़िंदगी से चाहते हैं,

वो मिलता नहीं है..

और जो मिलता है,

वो सँभाले से भी नहीं सँभलता..

आखिरकार हम उसको भी खो देते हैं..

रोती मुस्कान

रोती मुस्कान …

 

ज़िंदगी में रंग कैसे भरा जाता है,
ये तो कोई आप से सीखे ।

ग़म के बादलों को कैसे चाँदनी की रोशनी से सजाया जाता है,
ये तो कोई आप से सीखे ।

आँखों में बहने वाले समन्दर को कैसे खिलखिलाती कलियों की मुस्कराहट से बदला जाता है,
ये तो कोई आप से सीखे ।

पर; दिल में प्यार की उमंग भरने के बाद उसे कैसे नफ़्रत से जलाया जाता है,
ये भी कोई आप से सीखे ।

बहाना…

बहाना…

इज़हार करना हमें आता नहीं है
इनकार करन भी हमें आता नहीं है
पर इस वजह से कोई हमें ठुकरा दे
ये हमें मंज़ूर नहीं है…