जाग! कुछ कर!

जाग! कुछ कर!

वादा करो अपने-आप से
कभी झुकोगे नहीं
कभी पीछे देखोगे नहीं

ज़िन्दगी आगे बढ़ने का नाम है!
तो आगे बढ़!

जो बीत गया, सो बीत गया।
कल की फ़िकर मत कर!
आज की देख!

उठ! जाग! कुछ कर!
रास्ते अपने-आप खुलते जाएँगे!

नौकरी की तलाश

नौकरी की तलाश

नौकरी ढूँढते-ढूँढते थक गई हूँ
रोज़ की बातें सुन-सुनकर थक गई हूँ
सोचा नहीं था ऐसा पड़ाव भी आएगा!
सपने तो कई बुने थे
पर इन सब में बस एक की पूरी नहीं हुई : नौकरी!

कूंठित, तनाव से भरा जीवन
चाह है आगे बढ़ने की
अपनों की मदद करने की
पर पत्थर के नींचे हाथ डबे हैं!

ऐ ज़िन्दगी! तेरी नौकरी से भी थक गई हूँ!
चार दिवारी में बन्द
घर-बार देखना, रसोई चलाना
इन्हीं ज़िम्मेदारियों को पूरा करते-करते
अपना अस्तित्व खो दिया है।

अब किसे दोषी ठहराऊँ?
हालत को, समाज को,
माँ-बाप को, शिक्षण प्रणाली को,
सत्ता को या अपने-आप को?

झूठे रिश्ते

झूठे रिश्ते

नैनों के कोने में छिपे आँसू
ज़िंदगी की दास्तान
बयान कर देते हैं…

अकेलेपन में रो लिया करते हैं।
क्या करें… दुखरा किसको सुनाऊँ?
सुननेवाले कहाँ हैं?

जो मिले भी थे कुछ,
उन्होंने तो सुनकर भी अनसुना कर दिया
और मुझीको कसूरवार ठहरा दिया…

अपनो से तो डर लगने लगा है..
ज़हरीले साँप से भी ज़्यादा खतरनाक़ हैं…
ऐसे रिश्ते-नाते निभाने से तो
अकेलापन ही अच्छा है…

दिल में जैसे अँगाड़े फूट रहे हों..
जी करता है ज़ोर-ज़ोर से
चीखकर इन अफ़्वाहों को मिटाउँ
पर क्या फ़ायदा?

दुनिया और समाज!
ये दोनों तो हैं ही जले पर नमक छिरखनेवाले!
इनकी बोलती कभी बन्द हुई है जो अब होगी?
ख़ैर! बोलने दो!
सौ दिन इनके पर;
कभी-न-कभी वो एक दिन मेरा भी आएगा!

अभाव

अभाव

जीवन में सैकड़ों, कड़ोड़ों आंक्षाएँ होती हैं,

जिनकी पूर्ति करते-करते, मानस सुद्ध-बुद्ध खोकर लड़ता-रहता है।

कभी अपने तो कभी अपनों के लिए।
इन तृष्णाओं को तृप्त करने हेतु,
सालों-साल बीत जाते हैं…

अगर किसी एक की भी त्रुप्ति हो भी जाती है
तो दूसरी अंकुरित हो जाती है!
इस चक्र से कोई बचा कहाँ है?

सोचती हूँ कि अभाव के साथ जीना क्या इतना कठिन है?
अभाव के पीछे मत भागो!
जो कुछ भी मिला है,
मात्र, उसी में आनन्द ढूँढो!
इसी में समझदारी होगी!