उड़ते क़दम

उड़ते क़दम

ज़मीन पर टिकने वाले लोग आजकल मिलते कहाँ है?
चार दिन की चाँदनी के लिए,
बस बेच देते हैं अपने आप को
और कहते है,
हम इज़्ज़दार घराने के हैं!

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एक तरफ़ तन्हाई, दुसरी तरफ़ रुस्वाई।
एक तरफ़ इन्कार , दुसरी  तरफ़ इकरार ।
अब क्या करें, हाले दिल, किस को सुनाएँ?
कम्बक़्त, चैन से जीने नही देता!

डबाएँगे तो भला क्या मिलेगा!
बताएँगे भी तो क्या हासिल होगा!
बस लगता है, दिल ही में चुप रखना होगा!
क्या पत, बिना कहे ही, वो समझ जाएँ!

किसी की आवाज़ ने जिस तरीके से जादू किया, क्या कहें
जी करता है बस उसी को सवेरे शाम सुनती रहूँ
पर कम्बक़्त ये जो वक़्त है, हमेशा कबाब में हड्डी करती है!
अगर वक़्त की बन्दिश नही होती, तो कब का हम उसे क़ैद करके रखते!

नया सिलसिला है, नई दोस्ति है..
नए मौसम है, नया जहान है…
अब इस पहेली को सुल्झाना, एक नशा सा बन गया है…

शैतानी मौसम

शैतानी मौसम

ये राज़ नही जानम,
मौसम की मस्तानी सी शरारती बहार का मिलाव है,
जिसमें ये पत्ते, झड़ने, बारिश और ये तेज़ झड़ोंके से बेहती हवाओं ने भी महसूस किया है…
कभी न कभी तेरा-मेरा सामना इनसे भी होगा!