बिकाऊ दुनिया

बिकाऊ दुनिया

ये देश गुलामों की है |
यहाँ बच्चे के जन्म से माँ की दूध तक सब कुछ बिकता है!

इंसानों की रोज़ बोलियाँ लगती हैं!
अरमान बिकते हैं…

जहां पर शैतान को खुदा मान लिया
वहां पर भगवान् बिकता है!

तो क्या हुआ? तो क्या हुआ,
अगर ये लोग बिक रहे हों तो?

अगर फिल्मों के गाने बिक सकते हैं,
दाम देकर अगर जूते-बर्तन बिक सकते हैं,
तो भला, स्कुल का मास्टर नहीं बिक सकता?
अस्पताल का डाक्टर नहीं बिक सकता?

क्या हुआ अगर बच्चा पढ़ाई से छूट गया हो,
भविष्य ही अंधा हो गया हो?
तो क्या हुआ अगर मरीज़ लड़ते-लड़ते,
जीवन से ही हाथ धो लिया हो?
जेबे तो भरी होनी चाहिए!

अरे! जब घोडा रेस में बिक रहा है,
तो वकील केस में क्यों नहीं बिक सकता?

अगर दिलदार की नगरी में,
दिलवाले बिक रहे हैं,
और बेवफाई के आलम में,
वफादार बिक रहे हैं,
तो दोस्ती में भला कौन बिक रहा होगा?
दोस्त!

निष्ठा

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उड़ते क़दम

उड़ते क़दम

ज़मीन पर टिकने वाले लोग आजकल मिलते कहाँ है?
चार दिन की चाँदनी के लिए,
बस बेच देते हैं अपने आप को
और कहते है,
हम इज़्ज़दार घराने के हैं!

एक तरफ़ तन्हाई, दुसरी तरफ़ रुस्वाई।
एक तरफ़ इन्कार , दुसरी  तरफ़ इकरार ।
अब क्या करें, हाले दिल, किस को सुनाएँ?
कम्बक़्त, चैन से जीने नही देता!

डबाएँगे तो भला क्या मिलेगा!
बताएँगे भी तो क्या हासिल होगा!
बस लगता है, दिल ही में चुप रखना होगा!
क्या पत, बिना कहे ही, वो समझ जाएँ!

किसी की आवाज़ ने जिस तरीके से जादू किया, क्या कहें
जी करता है बस उसी को सवेरे शाम सुनती रहूँ
पर कम्बक़्त ये जो वक़्त है, हमेशा कबाब में हड्डी करती है!
अगर वक़्त की बन्दिश नही होती, तो कब का हम उसे क़ैद करके रखते!

नया सिलसिला है, नई दोस्ति है..
नए मौसम है, नया जहान है…
अब इस पहेली को सुल्झाना, एक नशा सा बन गया है…

शैतानी मौसम

शैतानी मौसम

ये राज़ नही जानम,
मौसम की मस्तानी सी शरारती बहार का मिलाव है,
जिसमें ये पत्ते, झड़ने, बारिश और ये तेज़ झड़ोंके से बेहती हवाओं ने भी महसूस किया है…
कभी न कभी तेरा-मेरा सामना इनसे भी होगा!

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